मेरे द्वारा लिखे जा रहे ब्लॉग्स मे इंडियन लॉ एवम भारतीय सविंधान से संबंधित legal content , व विधिक जानकारी,उपबंध,सुचना,प्रावधान, एवम ऐसी शब्दावली को भी परिभाषित किया गया है जो कि जन सामान्य के लिए कठिन है तथा जो प्रथम दृष्टया देखने या पढ़ने से साधारणतः समझ मे नही आते हैं अतः मेरे द्वारा ऐसी जानकारी एवम विधिक शब्दावली को इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से आसान शब्दों मे समझाने का प्रयास किया गया ।
" Golden hour " घायल के लिए संजीवनी
( मोटर व्हीकल अधिनियम 1988 ) संशोधन 2019
मोटरयान अधिनियम में केंद्रीय सरकार ने 2019 में संशोधन किया है, जिसके अनुसार धारा 134 (A) जोड़ी गई, इसमें यह संशोधन जोडा गया है कि जब किसी सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति मदद मांग रहा होता है ऐसे में आसपास का जो कोई व्यक्ति मदद के लिए आगे आता है, तथा दुर्घटना होने से एक घंटे के अंदर उसको हॉस्पिटल तक पहुचाता है, वो एक घंटा उस घायल के लिए " Golden hour " स्वर्णिम घंटा होता है, यही संशोधन 2019 में किया गया है, जिसे Golden hour नाम से जाना जाता है ।
सामान्यतः लोगों की यह मानसिकता होती है, कि मदद करेंगे तो उल्टा उन से ही सवाल जवाब व अन्य विधिक कार्यवाही में फंसने का डर होता है, तो ऐसे में रोड एक्सीडेंट के मामले में लोग मदद करने से पीछे हट जाते हैं ।
अतः अब इसी मानसिकता को दूर करते हुए सेंट्रल गवर्मेन्ट ने धारा 134 (A) जोड़कर यह प्रावधान किया है कि, घायल व्यक्ति को एक्सीडेंट होने पर पहले 01 घंटे में जिस भी व्यक्ति ने मदद की है, उसे सम्मानित किया जाएगा तथा पुलिस ट्रेनिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ( PTRI ) पुलिस मुख्यालय भोपाल द्वारा इस नेक काम के लिए जन भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए " Golden hour " संजीवनी केम्पेन शुरू किया है, इस कैम्पेन का उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओ की रोकथाम ओर दुर्घटना में घायलों की मदद के लिए नागरिकों को प्रेरित करता है ।
राज्य का महाधिवक्ता ( advocate general of the state ) कोन होता है ? व इनकी नियुक्ति कोन करता है ?
संविधान के अनुच्छेद 165 में राज्य के महाधिवक्ता की व्यवस्था की गई है । यह राज्य का सर्वोच्च कानून अधिकारी होता है , इस तरह यह महान्यायवादी का अनुपूरक होता है । महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, उसमे उच्च न्यायालय का न्यायधीश बनने की योग्यता होनी चाहिए, महाधिवक्ता का न कार्यकाल निश्चित है और नहीं हटाने की व्यवस्था की गई है, वह अपने पद पर राज्यपाल के प्रसादपर्यंत बना रहता है । तथा राज्यपाल द्वारा किसी भी समय अपने पद से हटाया जा सकता है । इसके वेतन भत्ते भी निश्चित नहीं है, इसका निर्धारण भी राज्यपाल द्वारा ही किया जाता है।
* महाधिवक्ता राज्य सरकार को विधि संबंधी विषयो पर सलाह देता है ।
* विधिक स्वरुप के ऐसे अन्य कार्य करता है, जो राज्यपाल द्वारा सोंपे गए हो ।
* उसे राज्य के किसी भी न्यायालय में सुनवाई का अधिकार होता है ।
* इसके अतिरिक्त विधानमंडल के दोनों सदनो में भाग लेने का व बोलने का अधिकार भी है । तथा वे सभी विशेषाधिकार एवं भत्ते मिलते हैं जो विधानमंडल के किसी भी सदस्य को मिलते है ।
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भारत का महान्यायवादी ( attorney general of india ) कौन होता है ,ओर इनकी नियुक्ति कोन करता है ?
संविधान के अनुच्छेद 76 में भारत के महान्यायवादी पद की व्यवस्था की गई है । यह देश का सर्वोच्च कानूनी अधिकारी होता है । महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है, उसमें उन योग्यता का होना आवश्यक है जो उच्चतम न्यायालय के लिए आवश्यक है । इसका कार्यकाल निश्चित नहीं है , राष्ट्रपति द्वारा कभी भी हटाया जा सकता है ।
महान्यायवादी का पारिश्रमिक भी तय नहीं है, राष्ट्रपति के द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक ही मिलता है ।
महान्यायवादी भारत सरकार से संबंधित मामले देखता है , व सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करता है । भारत सरकार के किसी भी क्षेत्र में किसी भी अदालत में महान्यायवादी को सुनवाई का अधिकार है । इसके अलावा उसे संसद के दोनों सदनों में बोलने या कार्यवाही में भाग लेने या संयुक्त बैठक में भाग लेने का अधिकार होता है । उसे एक संसद सदस्य की तरह सभी भत्ते एवं विशेषाधिकार मिलते हैं ।
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भारत सरकार को विधि संबंधित विषयों पर सलाह देता है, हालांकि महान्यायवादी सरकार का पूर्णकालिक वकील नहीं है, वह एक सरकारी कर्मी की श्रेणी में नहीं आता है, इसलिये उसे प्राइवेट प्रैक्टिस से नही रोका जा सकता है ।
महान्यायवादी केंद्रीय कैबिनेट का सदस्य नहीं होता है तथा सरकारी स्तर पर विधिक मामलो को देखने के लिए केंद्रीय कैबिनेट में प्रथक विधिक मंत्री होता हैं ।
राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन, कार्य, तथा उसकी शक्तियां
राज्य मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम - 1993 केंद्र तथा राज्यों दोनों में स्थापित है । अब तक 26 राज्यों ने राज्य मानवाधिकार आयोगों की स्थापना की है । यह आयोग हमारे मानवाधिकारो के उल्लंघन की जांच करता है । जो संविधान द्वारा हमें मानव होने के नाते प्रदान किये गए है ।
मानवाधिकार आयोग मामलो की जांच न्यायालय के आदेश से, या स्वप्रेरणा से भी कर सकता है
यह आयोग कोर्ट में भी लंबित किसी मानवाधिकार से संबंधित कार्यवाही में हस्तक्षेप भी कर सकता है ।
विधिक उपबंधों की समीक्षा करता है तथा उनके प्रभावी क्रियान्वयन हेतु उपायों की सिफारिश भी करता है ।
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मानवाधिकारो के क्षेत्र में शोध कार्य करना एवं उसे प्रोत्साहित करना । यह आयोग गेर सरकारी संगठन ( NGO ) को सहयोग एवं प्रोत्साहन देता है । आतंकवाद सहित उन सभी कारणों की समीक्षा करता है , जिससे मानवाधिकारो का उल्लंघन होता है ।
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इस आयोग को दीवानी न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होती है , यह किसी मामले की सुनवाई के लिये, राज्य सरकार या किसी अन्य अधीनस्थ प्राधिकारी को निर्देश दे सकता है । हालांकि यह मामले की सुनवाई नहीं करता, मानवाधिकार आयोग मामलों को 1 वर्ष के भीतर निपटाने की कोशिश करता है। मानवाधिकार नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करता है, हर व्यक्ति को चाहे वह हत्या ( 302 ) का ही दोषी क्यो न हो , उसे भी गरिमा के साथ जीने का अधिकार है , कोई भी अन्य व्यक्ति उसके जन्मजात दिये गए अधिकार या संविधान द्वारा प्रदत मूल अधिकारों को नही छीन सकता है ।
इस प्रकार मानवाधिकार आयोग हर व्यक्ति के मूलभुत अधिकारों का पहरेदार है , मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन में पीड़ित व्यक्ति स्वयं तो हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा ही सकता है, लेकिन वह मानवाधिकार आयोग के जरिये भी न्याय प्राप्त कर सकता है ।
दबाव समूह क्या है, इसके कार्य, व महत्व क्या है ?
दबाव समूह, उन लोगों का समूह होता है जो सक्रिय रूप से संगठित है । जो अपने हितों को बढ़ावा देते हैं उनकी प्रतिरक्षा करते हैं, या यह कह सकते हैं कि सरकार पर दबाव बनाकर लोकनीति को बदलने की कोशिश करते हैं । ये सरकार ओर उनके सदस्यों के बीच संपर्क का काम करते हैं ।इन दबाव समूहो को हितार्थ समूह भी कहा जाता है । ये राजनीतिक दलों से भिन्न होते हैं । ये न तो चुनाव में भाग लेते हैं, ओऱ न ही राजनीतिक शक्तियों को हतियाने की कोशिश करते हैं । ये कुछ ख़ास कार्यक्रमो ओर मुद्दो से सम्बंधित होते है । ओर इनकी इच्छा, सरकार में प्रभाव बनाकर अपने सदस्यों की रक्षा ओऱ हितो को बढ़ाना होता है ।
दबाव समूह विधिक ओर तर्क संगत तरीको द्वारा सरकार की नीति निर्माण ओर नीति निर्धारण को प्रभावित करते है । जैसे कि - सभाए करना, पत्राचार, जन प्रचार अनुरोध करना, जन वाद-विवाद अपने विधायकों के संबंधो को बनाए रखना आदि । इस तकनीक को " लॉबिंग " कहते है । वे जनता की राय को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं । चूँकि सरकार जनतांत्रिक होती है और जनता की राय से पूर्ण प्रभावित रहती है । इसे प्रचार व्यवस्था भी कहते है ।
भारत में बड़ी संख्या में दबाव समूह विधमान है । लेकिन ये उस तरह से विकसित नहीं हुए हैं , जिस तरह से अमेरिका व पश्चिम देशों में है ।
भारत में निम्न प्रकार के दबाव समूह है -
1) व्यवसायिक समूह 2) व्यपार संघ 3) खेतिहर समूह 4 ) जातीय समूह 5 ) धार्मिक संगठन 6 ) छात्र संगठन 7 ) आदिवासी संघटन 8 ) भाषागत समूह 9 ) पेशेवर समितिया 10 ) विचार धारा आधारित समूह ।
m.p. स्वतंत्रता अध्यादेश 2020 ( लव जिहाद )
MP स्वतंत्रता अध्यादेश 2020 , 9 january 2021 को प्रकाशित किया गया । इस अध्यादेश को लागू करने का मूल उद्देश्य कपटपूर्ण तरीके से एक धर्म से दूसरे धर्म में सपरिवर्तन को रोकना है ।
इस अध्यादेश में, अपराध होने पर न्यूनतम 1 वर्ष व 25000 रुपये की सज़ा का प्रावधान है । एवं अधिकतम 5 वर्ष तक की सजा भी हो सकती है ।
लव जिहाद, इसीका एक उदाहरण है, इस पर सबसे पहले कानून up state द्वारा लागू किया गया ।
इस अध्यादेश में किये गए अपराध को अजमानतीय ओर सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय योग्य श्रेणी में रखा गया है ।
अगर कोई व्यक्ति बिना दबाव के स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहे तो, उसे 60 दिन पूर्व जिला मजिस्ट्रेट को अपने कथन के साथ आवेदन प्रस्तुत करना होगा ।
इस अध्यादेश के परिणाम स्वरूप काफि हद तक धर्म परिवर्तन से सम्बंधित अपराधों पर प्रतिबंध लगाया जा सका है । हमारे संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मूल अधिकारों में से एक है ओर मूल अधिकारों का उल्लंघन वास्तव मे किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार है, जिसे की कोई भी अन्य व्यक्ति, कम नहीं कर सकता, ओर नही छीन सकता है, ऐसा करना अपराध है, ऐसे अपराध के लिए दंड की व्यवस्था करना ही इस अधिनियम का सर्वोच्च उद्देश्य है ।
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