भारत मे न्यायिक सक्रियता का सिद्धांत 1970 के दशक के मध्य में आया। न्यायिक सक्रियता की नींव न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर, पी.एन. भगवती, ओ.चिन्नप्पा रेडडी तथा डी. ए. देसाई ने रखी।
इसका अर्थ है , नागरिको के अधिकारों व समाज मे न्याय को बढ़ावा देने के उद्देश्य से न्यायपालिका खुद आगे बढ़कर सक्रिय होकर कार्य करती है, न्यायपालिका स्वंय एक्टिव होकर समाजहित में , जन कल्याण में कार्य करती है ।
" न्यायिक सक्रियता को न्यायिक गतिशीलता " भी कहते है
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