विश्वास प्रस्ताव क्या होता है ?

विश्वास प्रस्ताव - अधूरे जनादेश के परिणामस्वरूप, त्रिशंकु संसद, अल्पमत सरकार तथा गठबंधन सरकार आदि परिस्थितियों से निपटने के लिए एक प्रक्रियात्मक उपाय के तौर पर विश्वास प्रस्ताव का प्रावधान किया गया है कमजोर बहुमत वाली सरकारों को सदन में बहुमत सिद्व करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित किया जाता है, कभी-कभी स्वयं बहुमत सिद्व करने के लिए भी सरकार विश्वास प्रस्ताव लाती है, यदि यह विश्वास प्रस्ताव गिर जाता है तो सरकार भी गिर जाती है ।

जमानत ( Bail ) का अर्थ , जमानत के प्रकार

 जमानत - जब किसी व्यक्ति को, किसी अपराध के कारण पुलिस द्वारा या न्यायालय द्वारा कारागार में बंद किया जाता है ओर ऐसे व्यक्ति को कारागार से छुड़ाने के लिए, न्यायालय में जो संपत्ति जमा की जाती है , या देने की शपथ ली जाती है, उसे जमानत कहते हैं ।
जमानत के प्रकार -
1 ) रेगुलर ज़मानत
2 ) अंतरिम जमानत
3 ) अग्रिम जमानत

1 ) रेगुलर जमानत - CRPC  की धारा 439 में रेगुलर बैल या नार्मल बैल की व्यवस्था की गई है, जब आरोपी व्यक्ति का मामला कोर्ट में पेंडिंग होता है तब वह व्यक्ति उस दौरान जमानत की अर्जी लगा सकता है । तब ट्रायल कोर्ट या हाई कोर्ट जैसी भी स्थिति हो, अर्जी पर बैल देने से पहले मामले की गंभीरता ओर आरोपी व्यक्ति का पूर्वाचरण आदि सब देखने के बाद ही, बैल एप्लिकेशन स्वीकार या अस्वीकार करती है ।

2 ) अंतरिम बैल - जब आरोपित व्यक्ति बैल के लिये आवेदन करता है तो कोर्ट द्वारा जांच की जाती है, तथा जांच के दौरान समय भी लगता है तो ऐसी स्थिति में जब तक बैल आवेदन पर कोर्ट अंतिम निर्णय नहीं देती है, उससे पहले ही अंतरिम जमानत जिसे राहत बैल भी कह सकते हैं, प्रदान की जाती है ।

3 ) अग्रिम जमानत - जैसा की नाम से ही स्पष्ट है कि गिरफ्तारी से पहले ही होने वाली जमानत धारा 438, CRPC में प्रावधान है कि, जब किसी व्यक्ति को यह युक्तियुक्त आशंका हो कि कोई उसे अजमानतीय अपराध में फ़साने वाला है या उसकी गिरफ्तारी हो सकती है तो वह हाई कोर्ट या शेषन कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है, ओर यदि कोर्ट द्वारा उसकी अग्रिम जमानत स्वीकार कर ली जाती है, तो उसे संबंधित मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है ।





रिट याचिका का क्या अर्थ है ? यह कितने प्रकार की होती है ?

जब हमारे मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो हम सीधे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट रिट के माध्यम से मूल अधिकारों के क्रियान्वयन के लिए रिट याचिका जारी करवा सकते है । इस तरह दोनों ही न्यायालय को मूल अधिकारों का रक्षक एवं ग्यारंटी देने वाला न्यायालय कहा जाता है 
रिट याचिका सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट दोनों जारी कर सकते हैं
सुप्रीम कोर्ट में आर्टीकल - 32 के तहत
हाई कोर्ट में आर्टिकल - 226 के तहत

रिट याचिका 5 प्रकार की होती है -
1 ) बंदी प्रत्यक्षीकरण - इसे लेटिन भाषा से लिया गया है । जिसका अर्थ होता है, व्यक्ति को सशरीर प्रस्तुत किया जाए यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है, या जबरन उसकी स्वतंत्रता पर बंधन लगाया जा रहा है, तो ऐसा पीड़ित व्यक्ति स्वयं या उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति भी न्यायालय से "बंदी प्रत्यक्षीकरण " की रिट जारी करवा सकता है ।तब न्यायालय मामले की जांच करता है, तथा उसकी स्वतंत्रता के लिए आदेश जारी करता है । स्वतंत्र रहना हर व्यक्ति का मूल अधिकार है " बंदी प्रत्यक्षीकरण " रिट - सार्वजनिक प्राधिकरण हो या व्यक्तिगत दोनों के खिलाफ जारी की जा सकती है ।

2 ) परमादेश - इसका अर्थ है आदेश देना - इसे सार्वजनिक अधिकारियों के विरुद्ध जारी किया जाता है, यदि कोई सरकारी कर्मचारी, कोई यूनिट, निगम, प्राधिकरण, अधीनस्थ न्यायालय अपने कार्यों या कर्तव्यों का पालन करने से इंकार करते है, तब न्यायालय उनसे 
" परमादेश " रिट के जरिये आदेश देते हैं , कि वे अपने कर्तव्यों के पालन में उपेक्षा क्यो कर रहे है , उनसे कारण पूंछा जाता है । इस प्रकार " परमादेश " रिट के माध्यम से न्यायालय सरकारी अधिकारियों पर नियंत्रण का कार्य करते है ।

3 ) प्रतिषेध - इसका अर्थ है रोकना यह रिट याचिका न्यायिक प्रकृति की है, यदि कोई अधीनस्थ न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर कार्य करता है, या अपने अधिकारों का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं करता है, या नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया जाता है, तो हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट अधीनस्थ न्यायालयो को निर्णय देने से पहले रोक देता है, तथा उनसे आगे कार्यवाही करने के लिये मना कर दिया जाता है, जब तक कि वे सुपीरियर न्यायालय का समाधान न कर दे ।

4 ) उत्प्रेषण - " उत्प्रेषण रिट ओर प्रतिषेध रिट " दोनों ही न्यायिक नेचर की है, बस दोनों में इतना ही अंतर है कि प्रतिषेध रिट निर्णय के पहले जारी की जाती है, ओर उत्प्रेषण रिट निर्णय के बाद जारी की जा सकती हैं।

5 ) अधिकार प्रच्छा - जिसका अर्थ है " प्राधिकृत " या यह कह सकते है, कि कोई प्राधिकार्रवान व्यक्ति अपने अधिकार का दावा करता है, तो न्यायालय ऐसे व्यक्ति के दावे की जांच करने के बाद उस व्यक्ति के हित में जो वास्तव मे दावेदार है, उसे उसका अधिकार पुनः दिलाने के लिये " अधिकार प्रच्छा " रिट जारी करके उस व्यक्ति के खिलाफ आदेश जारी करता है जो अनाधिकृत रूप से कब्जा धारण किये हुए हैं ।यह रिट भी सार्वजनिक कार्यलयों के खिलाफ ही जारी की जाती है, जिससे कि वैध रूप से हकदार या प्राधिकार्रवान व्यक्ति को कोई हानि या नुकसान न उठाना पड़े ।


राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति

संविधान के अनुच्छेद 72 में राष्ट्रपति को क्षमा करने की शक्ति प्रदान की गई है । राष्ट्रपति की यह शक्ति न्यायपालिका से स्वतंत्र है । यह एक कार्यकारी शक्ति है।
राष्ट्रपति की शक्ति के दो रूप है - 
1 ) विधि (कानून ) में होने वाली गलती को सुधारना
2 ) अधिक कठोर दंड को कम करना ।
राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति में निम्न बाते शामिल है
* क्षमा - इसमे दोषी व्यक्ति को पूर्ण रूप से दंड से मुक्त कर दिया जाता है ।
* लघुकरण - इसका अर्थ है, दंड के स्वरूप को बदलकर कम करना, जैसे मृत्युदंड का लघुकरण कर कठोर कारावास मे परिवर्तीत कर देना ।
* परिहार - इसका अर्थ है, दंड की प्रकृति मे परिवर्तन किये बिना उसकी अवधि कम करना , जैसे दो वर्ष के कठोर कारावास को एक वर्ष के कठोर कारावास में बदलना ।
* विराम - इसका अर्थ है, दोषी व्यक्ति को मूल रूप से दी गई सजा को किन्ही विशेष परिस्थितियों में कम करना, जैसे - शारिरिक अपंगता , गर्भावस्था आदि ,
* निलंबन - इसका अर्थ है , किसी दंड़ (  विशेषकर मृत्युदंड ) पर अस्थाई रोक लगाना इसका उद्देश्य है, दोषी व्यक्ति को क्षमायाचना या दंड के स्वरूप में परिवर्तन के लिये समय देना ।

राष्ट्रपति की वीटो पावर

संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक तभी अधिनियम बनता है, जब राष्ट्रपति उसे अपनी सहमति देता है ।राष्ट्रपति के पास ऐसे विधेयक पर सहमति से पहले तीन विकल्प होते हैं ।

1 ) विधेयक पर अपनी स्वीकृति दे दे ।
2) विधेयक पर अपनी सहमति सुरक्षित रख ले
3) संसद में पुनर्विचार के लिए लोटा दे ।
अब पॉकेट वीटो या वीटो के मामले में राष्ट्रपति विधेयक पर न तो कोई सहमति देता है , न अस्वीकृत करता है, ओर न ही लौटाता है, किंतु एक अनिश्चित काल के लिये विधेयक को लंबित कर देता है । राष्ट्रपति को, किसी विधेयक को रोककर रखने की शक्ति ही " वीटो पावर " कहलाता है। राष्ट्रपति इस वीटो पावर का प्रयोग इस आधार पर करता है कि किसी विधेयक पर निर्णय देने के लिये कोई समय सीमा तय नहीं है । संविधान द्वारा प्रदत्त यह विषेशाधिकार राष्ट्रपति की शक्ति अद्वितीय है ।
किन्तु एक बात ओर है कि वीटो पावर का प्रयोग धन विधेयक पर लागू नहीं होता है ।

आपातकाल ( emergency )

हमारे संविधान के भाग - 8 में आर्टिकल 352 से 360 तक आपातकालीन प्रावधानों के बारे में उल्लेख है । ये प्रावधान केंद्र ( central ) को किसी भी असामान्य परिस्थिति से निपटने में सक्षम बनाते है । 
आपातकालीन स्थिति में केंद्र सरकार सर्वशक्तिमान हो जाती हैं ।
संविधान में 3 प्रकार के आपातकाल को निर्दिष्ट किया है-
1 ) आर्टिकल 352 - (राष्ट्रीय आपात ) - यदि भारत को या उसके किसी भाग को, युद्ध, बाहय आक्रमण या सशत्र विद्रोह के कारण खतरा उत्पन्न हो गया हो तो राष्ट्रपति द्वारा " राष्ट्रीय आपात " की घोषणा की जाती है।
2 ) आर्टिकल 356 - (राष्ट्रपति शासन ) - जब किसी राज्य में राजकीय व्यवस्था या संविधानिक क्रियाकलाप अव्यवस्थित हो जाता है या जिसको की राज्य सरकार पूर्ण रूप से संभालने में विफल हो जाती है, तो ऐसी विफलता के परिणामस्वरूप राज्य सरकार राष्ट्रपति से अनुरोध करती है कि राज्य की शासन व्यवस्था को आप संचालित कीजिए । ऐसी असामान्य परिस्थिति में राज्य की बागडोर राष्ट्रपति (केंद्र ) के हाथो मै आ जाती है जिसे ही साधारण शब्दों में " राष्ट्रपति शासन " के नाम से जाना जाता है ।
3 ) आर्टिकल 360 ( वित्तीय आपात ) - जब भारत की वित्तीय स्थायित्व या साख खतरे में पड़ जाती है, या राष्ट्रपति को लगता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि, भारत के या उसके किसी क्षेत्र की वित्तीय स्थिति खतरे में है , तो वह वित्तीय आपात की घोषणा कर सकते है । राष्ट्रपति की यह शक्ति अंतिम ओर निर्णायक है तथा किसी न्यायालय में किसी भी आधार पर प्रश्न योग्य नहीं है । इससे राष्ट्रपति किसी भी श्रेणी के व्यक्तियों के वेतन-भत्तों में कटौती के निर्देश जारी कर सकता है  । वैसे भारत में आज तक कभी भी " वित्तीय आपात "  की स्थिति नही बनी है ।

महाभियोग क्या होता है ?

यह एक अर्ध न्यायिक प्रक्रिया है, जो कि संविधान के आर्टिकल 61 में प्रावधानित है। राष्ट्रपति को अपने पद से हटाने के लिये महाभियोग प्रक्रिया का प्रयोग किया जाता है । जब राष्ट्रपति द्वारा " संविधान का उल्लंघन " किया जाता है या संविधान का पालन नहीं किया जाता है तब राष्ट्रपति को अपने पद से हटाने के लिये महाभियोग लाया जाता है ।



महाभियोग का आरोप संसद के किसी भी सदन में प्रारम्भ किया जा सकता है,लेकिन महाभियोग लगाने से पहले राष्ट्रपति को 14 दिन का नोटिस दिया जाता है, तथा जो सदन महाभियोग लाता है उस सदन के दो तिहाई सदस्यों द्वारा पारित हो जाने के बाद उसे दूसरे सदन में भेजा जाता है, तथा दूसरा सदन उन आरोपों की जाँच करता है, तथा सही पाता है ओर यदि वहा से भी दो तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है तो- महाभियोग की प्रक्रिया पूर्ण मान ली जाती है, हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में राष्ट्रपति को उपस्थित होने तथा अपना प्रतिनिधित्व करने का पूरा अधिकार होता हैं । किंतु यदि राष्ट्रपति अपना उचित प्रतिनिधित्व करने मे असफल रहते है,तो जिस दिन से महाभियोग दोनों सदनों से पारित होता है, उसी दिन से राष्ट्रपति को अपना पद त्यागना पड़ता है ।
यही प्रकिया " महाभियोग "कहलाती है




पूजा स्थल कानून ( worship act 1991) क्या हे ?

 * कांग्रेस की नरसिम्हा सरकार 1991 में  यह कानून लेकर आई थी |   *मंदिर आन्दोलन के दोर में बढते, मंदिर - मस्जिद  विवादों को रोकने...