मेरे द्वारा लिखे जा रहे ब्लॉग्स मे इंडियन लॉ एवम भारतीय सविंधान से संबंधित legal content , व विधिक जानकारी,उपबंध,सुचना,प्रावधान, एवम ऐसी शब्दावली को भी परिभाषित किया गया है जो कि जन सामान्य के लिए कठिन है तथा जो प्रथम दृष्टया देखने या पढ़ने से साधारणतः समझ मे नही आते हैं अतः मेरे द्वारा ऐसी जानकारी एवम विधिक शब्दावली को इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से आसान शब्दों मे समझाने का प्रयास किया गया ।
" Golden hour " घायल के लिए संजीवनी
( मोटर व्हीकल अधिनियम 1988 ) संशोधन 2019
मोटरयान अधिनियम में केंद्रीय सरकार ने 2019 में संशोधन किया है, जिसके अनुसार धारा 134 (A) जोड़ी गई, इसमें यह संशोधन जोडा गया है कि जब किसी सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति मदद मांग रहा होता है ऐसे में आसपास का जो कोई व्यक्ति मदद के लिए आगे आता है, तथा दुर्घटना होने से एक घंटे के अंदर उसको हॉस्पिटल तक पहुचाता है, वो एक घंटा उस घायल के लिए " Golden hour " स्वर्णिम घंटा होता है, यही संशोधन 2019 में किया गया है, जिसे Golden hour नाम से जाना जाता है ।
सामान्यतः लोगों की यह मानसिकता होती है, कि मदद करेंगे तो उल्टा उन से ही सवाल जवाब व अन्य विधिक कार्यवाही में फंसने का डर होता है, तो ऐसे में रोड एक्सीडेंट के मामले में लोग मदद करने से पीछे हट जाते हैं ।
अतः अब इसी मानसिकता को दूर करते हुए सेंट्रल गवर्मेन्ट ने धारा 134 (A) जोड़कर यह प्रावधान किया है कि, घायल व्यक्ति को एक्सीडेंट होने पर पहले 01 घंटे में जिस भी व्यक्ति ने मदद की है, उसे सम्मानित किया जाएगा तथा पुलिस ट्रेनिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ( PTRI ) पुलिस मुख्यालय भोपाल द्वारा इस नेक काम के लिए जन भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए " Golden hour " संजीवनी केम्पेन शुरू किया है, इस कैम्पेन का उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओ की रोकथाम ओर दुर्घटना में घायलों की मदद के लिए नागरिकों को प्रेरित करता है ।
राज्य का महाधिवक्ता ( advocate general of the state ) कोन होता है ? व इनकी नियुक्ति कोन करता है ?
संविधान के अनुच्छेद 165 में राज्य के महाधिवक्ता की व्यवस्था की गई है । यह राज्य का सर्वोच्च कानून अधिकारी होता है , इस तरह यह महान्यायवादी का अनुपूरक होता है । महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, उसमे उच्च न्यायालय का न्यायधीश बनने की योग्यता होनी चाहिए, महाधिवक्ता का न कार्यकाल निश्चित है और नहीं हटाने की व्यवस्था की गई है, वह अपने पद पर राज्यपाल के प्रसादपर्यंत बना रहता है । तथा राज्यपाल द्वारा किसी भी समय अपने पद से हटाया जा सकता है । इसके वेतन भत्ते भी निश्चित नहीं है, इसका निर्धारण भी राज्यपाल द्वारा ही किया जाता है।
* महाधिवक्ता राज्य सरकार को विधि संबंधी विषयो पर सलाह देता है ।
* विधिक स्वरुप के ऐसे अन्य कार्य करता है, जो राज्यपाल द्वारा सोंपे गए हो ।
* उसे राज्य के किसी भी न्यायालय में सुनवाई का अधिकार होता है ।
* इसके अतिरिक्त विधानमंडल के दोनों सदनो में भाग लेने का व बोलने का अधिकार भी है । तथा वे सभी विशेषाधिकार एवं भत्ते मिलते हैं जो विधानमंडल के किसी भी सदस्य को मिलते है ।
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भारत का महान्यायवादी ( attorney general of india ) कौन होता है ,ओर इनकी नियुक्ति कोन करता है ?
संविधान के अनुच्छेद 76 में भारत के महान्यायवादी पद की व्यवस्था की गई है । यह देश का सर्वोच्च कानूनी अधिकारी होता है । महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है, उसमें उन योग्यता का होना आवश्यक है जो उच्चतम न्यायालय के लिए आवश्यक है । इसका कार्यकाल निश्चित नहीं है , राष्ट्रपति द्वारा कभी भी हटाया जा सकता है ।
महान्यायवादी का पारिश्रमिक भी तय नहीं है, राष्ट्रपति के द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक ही मिलता है ।
महान्यायवादी भारत सरकार से संबंधित मामले देखता है , व सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करता है । भारत सरकार के किसी भी क्षेत्र में किसी भी अदालत में महान्यायवादी को सुनवाई का अधिकार है । इसके अलावा उसे संसद के दोनों सदनों में बोलने या कार्यवाही में भाग लेने या संयुक्त बैठक में भाग लेने का अधिकार होता है । उसे एक संसद सदस्य की तरह सभी भत्ते एवं विशेषाधिकार मिलते हैं ।
Must read - राज्य का महाधिवक्ता ( advocate general of the state ) कौन होता है, व इनकी नियुक्ति कौन करता है ।
भारत सरकार को विधि संबंधित विषयों पर सलाह देता है, हालांकि महान्यायवादी सरकार का पूर्णकालिक वकील नहीं है, वह एक सरकारी कर्मी की श्रेणी में नहीं आता है, इसलिये उसे प्राइवेट प्रैक्टिस से नही रोका जा सकता है ।
महान्यायवादी केंद्रीय कैबिनेट का सदस्य नहीं होता है तथा सरकारी स्तर पर विधिक मामलो को देखने के लिए केंद्रीय कैबिनेट में प्रथक विधिक मंत्री होता हैं ।
राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन, कार्य, तथा उसकी शक्तियां
राज्य मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम - 1993 केंद्र तथा राज्यों दोनों में स्थापित है । अब तक 26 राज्यों ने राज्य मानवाधिकार आयोगों की स्थापना की है । यह आयोग हमारे मानवाधिकारो के उल्लंघन की जांच करता है । जो संविधान द्वारा हमें मानव होने के नाते प्रदान किये गए है ।
मानवाधिकार आयोग मामलो की जांच न्यायालय के आदेश से, या स्वप्रेरणा से भी कर सकता है
यह आयोग कोर्ट में भी लंबित किसी मानवाधिकार से संबंधित कार्यवाही में हस्तक्षेप भी कर सकता है ।
विधिक उपबंधों की समीक्षा करता है तथा उनके प्रभावी क्रियान्वयन हेतु उपायों की सिफारिश भी करता है ।
Must read - भारत का महान्यायवादी ( attorney general of india ) कोन होता है , और इनकी नियुक्ति कौन करता है ।
मानवाधिकारो के क्षेत्र में शोध कार्य करना एवं उसे प्रोत्साहित करना । यह आयोग गेर सरकारी संगठन ( NGO ) को सहयोग एवं प्रोत्साहन देता है । आतंकवाद सहित उन सभी कारणों की समीक्षा करता है , जिससे मानवाधिकारो का उल्लंघन होता है ।
Must read - Law of india
इस आयोग को दीवानी न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होती है , यह किसी मामले की सुनवाई के लिये, राज्य सरकार या किसी अन्य अधीनस्थ प्राधिकारी को निर्देश दे सकता है । हालांकि यह मामले की सुनवाई नहीं करता, मानवाधिकार आयोग मामलों को 1 वर्ष के भीतर निपटाने की कोशिश करता है। मानवाधिकार नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करता है, हर व्यक्ति को चाहे वह हत्या ( 302 ) का ही दोषी क्यो न हो , उसे भी गरिमा के साथ जीने का अधिकार है , कोई भी अन्य व्यक्ति उसके जन्मजात दिये गए अधिकार या संविधान द्वारा प्रदत मूल अधिकारों को नही छीन सकता है ।
इस प्रकार मानवाधिकार आयोग हर व्यक्ति के मूलभुत अधिकारों का पहरेदार है , मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन में पीड़ित व्यक्ति स्वयं तो हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा ही सकता है, लेकिन वह मानवाधिकार आयोग के जरिये भी न्याय प्राप्त कर सकता है ।
दबाव समूह क्या है, इसके कार्य, व महत्व क्या है ?
दबाव समूह, उन लोगों का समूह होता है जो सक्रिय रूप से संगठित है । जो अपने हितों को बढ़ावा देते हैं उनकी प्रतिरक्षा करते हैं, या यह कह सकते हैं कि सरकार पर दबाव बनाकर लोकनीति को बदलने की कोशिश करते हैं । ये सरकार ओर उनके सदस्यों के बीच संपर्क का काम करते हैं ।इन दबाव समूहो को हितार्थ समूह भी कहा जाता है । ये राजनीतिक दलों से भिन्न होते हैं । ये न तो चुनाव में भाग लेते हैं, ओऱ न ही राजनीतिक शक्तियों को हतियाने की कोशिश करते हैं । ये कुछ ख़ास कार्यक्रमो ओर मुद्दो से सम्बंधित होते है । ओर इनकी इच्छा, सरकार में प्रभाव बनाकर अपने सदस्यों की रक्षा ओऱ हितो को बढ़ाना होता है ।
दबाव समूह विधिक ओर तर्क संगत तरीको द्वारा सरकार की नीति निर्माण ओर नीति निर्धारण को प्रभावित करते है । जैसे कि - सभाए करना, पत्राचार, जन प्रचार अनुरोध करना, जन वाद-विवाद अपने विधायकों के संबंधो को बनाए रखना आदि । इस तकनीक को " लॉबिंग " कहते है । वे जनता की राय को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं । चूँकि सरकार जनतांत्रिक होती है और जनता की राय से पूर्ण प्रभावित रहती है । इसे प्रचार व्यवस्था भी कहते है ।
भारत में बड़ी संख्या में दबाव समूह विधमान है । लेकिन ये उस तरह से विकसित नहीं हुए हैं , जिस तरह से अमेरिका व पश्चिम देशों में है ।
भारत में निम्न प्रकार के दबाव समूह है -
1) व्यवसायिक समूह 2) व्यपार संघ 3) खेतिहर समूह 4 ) जातीय समूह 5 ) धार्मिक संगठन 6 ) छात्र संगठन 7 ) आदिवासी संघटन 8 ) भाषागत समूह 9 ) पेशेवर समितिया 10 ) विचार धारा आधारित समूह ।
m.p. स्वतंत्रता अध्यादेश 2020 ( लव जिहाद )
MP स्वतंत्रता अध्यादेश 2020 , 9 january 2021 को प्रकाशित किया गया । इस अध्यादेश को लागू करने का मूल उद्देश्य कपटपूर्ण तरीके से एक धर्म से दूसरे धर्म में सपरिवर्तन को रोकना है ।
इस अध्यादेश में, अपराध होने पर न्यूनतम 1 वर्ष व 25000 रुपये की सज़ा का प्रावधान है । एवं अधिकतम 5 वर्ष तक की सजा भी हो सकती है ।
लव जिहाद, इसीका एक उदाहरण है, इस पर सबसे पहले कानून up state द्वारा लागू किया गया ।
इस अध्यादेश में किये गए अपराध को अजमानतीय ओर सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय योग्य श्रेणी में रखा गया है ।
अगर कोई व्यक्ति बिना दबाव के स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहे तो, उसे 60 दिन पूर्व जिला मजिस्ट्रेट को अपने कथन के साथ आवेदन प्रस्तुत करना होगा ।
इस अध्यादेश के परिणाम स्वरूप काफि हद तक धर्म परिवर्तन से सम्बंधित अपराधों पर प्रतिबंध लगाया जा सका है । हमारे संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मूल अधिकारों में से एक है ओर मूल अधिकारों का उल्लंघन वास्तव मे किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार है, जिसे की कोई भी अन्य व्यक्ति, कम नहीं कर सकता, ओर नही छीन सकता है, ऐसा करना अपराध है, ऐसे अपराध के लिए दंड की व्यवस्था करना ही इस अधिनियम का सर्वोच्च उद्देश्य है ।
MSME ( mp ) विकास नीति 2021 क्या है
इस नीति के तहत छोटे-छोटे उधोगों को रियायतें ओर सुविधाए देकर mp को आत्मनिर्भर बनाना तथा स्थानीय युवाओं के कौशल उन्नयन के साथ उन्हें प्रदेश में ही रोजगार उपलब्ध करवाना है ।
MUST READ - m.p.स्वंतंत्रता अध्यादेश 2020 ( लव जिहाद )
इसके अनुसार 25 करोड़ स्थाई पूंजी, निवेश वाली नई यूनिट के लिए 5 वर्ष के लिये ब्याज अनुदान 2 % की दर से 5 करोड़ रुपये की सीमा तक दिये जाने का प्रावधान है ।
पैसा एक्ट क्या है ?
पैसा कानून के तहत आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को सभी गतिविधियों का केंद्र बनाने की कोशिश की गई है ।आदिवासी बाहुल्य गांवों में कौन से विकास कार्य कराए जाने है, ओर प्राथमिकता क्या रहेंगी यह ग्राम सभा ही तय करेंगी । जैसे -
* खनिजों का लायसेंस । वहां देने के लिए ग्राम सभा की सिफारिश लेना अनिवार्य है ।
* ग्राम बाजारो का प्रबंधन करने की शक्ति ।
* सामुदायिक वन प्रबंधन के तहत वनोपज सम्बंधी निर्णय लेना
* तेंदुपत्ता संग्रहण ओर विक्रय का काम ग्राम सभा करेंगी।
* शराब की दुकान खोलने के लिए ग्राम सभा की अनुमति लेनी होगी अनुमति के बिना नहीं खोल सकते ।तथा खदान के संचालन का निर्णय लेना ।
* आदिवासियों की भूमि पर किसी गैर आदिवासी ने कब्जा कर लिया है तो उसे वापस दिलाना ओऱ उसके लिए राजस्व विभाग भी कार्यवाही करता है ।
यह एक केंद्रीय कानून है, जो संविधान के 9 वें भाग में दिये गए आदिवासी उपबंधो में कुछ संशोधन के साथ विस्तारित करता है ओऱ जनजातीय जनसंख्या को स्वशासन प्रदान करता है । इस कारण इस अधिनियम का पूरा नाम पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विस्तार ) अर्थात पैसा अधिनियम रखा गया है ।
यह अधिनियम आदिवासी क्षेत्रों को विशेष दर्जा प्रदान करता है ।
आर्टीकल 370 क्या है
हमारे भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 जो कि j&k को विशेष प्रावधान देने की बात करता है अर्थात संसद द्वारा जो भी कानून बनाए जाते है , पूरे देश में लागू होता है, लेकिन j&k पर लागू नहीं होता ।
लेकिन अब जब आर्टीकल 370 के तहत जम्मू कश्मीर को जो विशेष दर्जा दिया गया था, उसे j/k पुनर्गठन बिल 2019 के तहत हटा दिया गया है ।
आज की स्थिति के अनुसार j&k भारत का हिस्सा है और वहां का अपना flag + constitution पूरी तरह से खत्म हो चूका है, अब Indian constitution ही वहां भी लागू होंगा तथा संसद द्वारा बनाए गए सारे नियम / कानून वहां भी लागू होंगे ।
पहले केंद्र सरकार j&k के सिर्फ कुछ क्षेत्रों के लिए ही कानून बना सकती थीं - जैसे
1 ) रक्षा
2) विदेश
3) संचार
इन तीनों क्षेत्रों के अलावा कोई कानून /नियम बनाया जाता था तो वहाँ के राज्य सरकार से परमिशन लेनी पड़ती थी । लेकिन अब ऐसा नहीं है ।
Must read - पैसा एक्ट क्या है ?
j&k की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष का होता था, अब हमारे संविधान के हिसाब से 5 वर्ष का ही हो गया है
इस प्रकार, j&k ओर लद्दाख़ दो केंद्र शाषित प्रदेशों के रूप में विभाजित हो गया है । 370 हटाने के बाद 890 केंद्रीय कानून वहां लागू हो गए हैं । 70 साल के बाद अब जम्मू कश्मीर के लोगों को जो नकारा गया , वह उन्हें दिया जाएगा । sc /st के उपबंध भी अब जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए उपलब्ध है । जम्मू कश्मीर के लोगों के पास दोहरी नागरिकता होती थी, दूसरे राज्यों के लोग वहां जमीन नहीं खरीद सकते थे , लेकिन अब ऐसा नहीं है ।
आर्टिकल 35 A क्या है , यह विवादित क्यो है ,
आर्टीकल 35 A जम्मू कश्मीर को राज्य के रूप में विशेष अधिकार देता है, इसके तहत दिये गए अधिकार
स्थाई निवासियों से जुड़े हुए है । अर्थात जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार को यह अधिकार देता है कि वह आजादी के वक्त दूसरी जगह से आए शरणार्थियों ओर अन्य भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर में किस तरह से सहूलियत दे अथवा नहीं ।
स्थाई नागरिको (J&K) से संबंधित कानून
1 ) इसके तहत, संविधान में कुछ भी हो, फिर भी कोई वर्तमान कानून ( J&K ) में क्रियान्वित नहीं होगा ।
2 ) ऐसे स्थाई नागरिकों को विशेषाधिकार देना , तथा अन्य व्यक्तियों पर इन क्षेत्रों में प्रतिबंध लगाना ।
* राज्य सरकार में नोकरी
* राज्य की अचल संपत्ति का अधिग्रहण
* राज्य में रहना / बसना
* राज्य द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्ति या कोई अन्य सहायता
MUST READ - आर्टीकल 370 क्या है ?
यह सब भारतीय नागरिकों को इसलिये नही दी जाती थी क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर के स्थाई नागरिकों के लिए ही विशेषाधिकार थे । लेकिन अब 5 अगस्त 2019 को आर्टिकल 35 A को निरस्त कर दिया गया ।इसके तहत सारे विशेषाधिकार भी निरस्त कर कर दिये गए है । यह आर्टिकल, आर्टीकल 370 का अपवाद माना जाता था। अब इस संशोधन के बाद भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर का नागरिक होने जैसे सारे अधिकार व सहायता प्राप्त हो गई है ।
केंद्रीय सतर्कता आयोग के कार्य
यह आयोग केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार रोकने के लिये एक प्रमुख संस्था है। भ्रष्टाचार रोकने के लिये संथानम समिति की सिफारिश पर इसका गठन हुआ
केंद्रीय सतर्कता आयोग को सार्वजनिक हित खुलासे एवं सूचना देने का सुरक्षा प्रस्ताव के तहत सूचना देने वालो द्वारा भ्रष्टाचार एवं कार्यालय के दुरूपयोग के किसी भी प्रकार के खुलासे एवं शिकायते प्राप्त करने एवं उन पर कार्यवाही करने हेतु अभिकरण बनाया गया । इसे व्हिसल ब्लोअर के नाम से भी जाना जाता है ।
अवश्य पढ़ें : " Golden hour " घायल के लिये संजीवनी
इसके अंतर्गत विभागीय जांचो के लिए CID लोक सेवकों के विरुद्ध कार्यवाहियों की मौखिक जांच पड़ताल करते हैं ।
केंद्रीय सतर्कता आयोग, कार्यवाही अपने मुख्यालय नई दिल्ली से संचालित करता है । इसके पास दिवानी न्यायालय की तरह सारी शक्तिया है ।यह आयोग न्यायिक प्रकृति का है । यह केन्द्र सरकार ओऱ उसके प्राधिकरणों से किसी भी प्रकार की रिपोर्ट की जानकारी एवं माँग कर सकता है । ताकि वह उनके सतर्कता एवं भ्रस्टाचार रहित कार्यों पर नजर रख सके ।
यह आयोग अपनी वार्षिक कार्यकलापों की रिपोर्ट राष्ट्रपति को देता है । राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं ।
इसके तहत जो व्यक्ति भ्रस्टाचार से सम्बंधित जानकारी देते हैं, उनकी पहचान को गोपनीय रखा जाता है, एवं उन पर किसी भी प्रकार की कोई लीगल कार्यवाही नहीं की जाती है । इससे सरकारी सेवकों द्वारा विशेषाधिकारो का मनमाना दुरुपयोग होने पर नियंत्रण लगाया जाता है ।
सूचना का अधिकार ( Right to information )
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक को सूचना लेने या जानने का अधिकार देता है, इस अधिकार के द्वारा किसी भी विभाग से कोई सूचना लेने का अधिकार प्राप्त है । सही अर्थों में से एक आम नागरिक ही देश को चलाता है, जब एक आम नागरिक कोई भी वस्तु खरीदता है, तो उसके साथ साथ कर का भी भुगतान करता है, कर के माध्यम से ही सरकार चलती है तो उसे यह जानने का पूरा अधिकार है कि सरकार किस विभाग में कितना पैसा ख़र्च करती है, किस अधिकारी या राजनेता की जेब में कितना पैसा जाता है इन सब प्रश्नों के जवाब सूचना के अधिकार के माध्यम से मांगे जाते हैं । इसके अंतर्गत आप सरकारी निर्णय की प्रति ले सकते हैं, सरकारी दस्तावेजों का निरीक्षण कर सकते हैं , सरकारी कार्यों का निरीक्षण कर सकते हैं ।
Must read - " Golden hour " घायल के लिये संजीवनी ।
( RIT ) के तहत प्रत्येक सरकारी विभाग में जन / लोक सूचना अधिकार होता है जिसके पास आवेदन जमा करना होता है, जिसके साथ 10 रुपये का आवेदन शुल्क देना पड़ता है, हालांकि विभिन्न राज्यों में अलग अलग शुल्क निर्धारित है । आवेदन के 30 दिनों के अंदर सूचना पाने का प्रावधान है , यदि सूचना अधिकारी सूचना देने मे देरी करता है तो वह अपने देरी के कारण को अभिलिखित करेंगा ओर यदि बिना किसी कारण के सूचना नहीं देता है , या देने से इंकार करता है तो सूचना मांगने वाला नागरिक धारा 19 के तहत अपील दायर कर सकता है । ओऱ यदि पहली अपील से भी संतुष्ट नहीं है, तब द्वितीय अपील भी कर सकता है ।
इस प्रकार RIT के तहत आम नागरिक ओऱ सरकारी विभागों के बीच पारदर्शिता बढ़ गई है ।
Must read -केंद्रीय सतर्कता आयोग के कार्य
युवा संसद क्या है ?
युवा संसद - युवा संसद चौथे अखिल भारतीय व्हिप सम्मेलन की अनुशंसा पर प्रारंभ की गई है ।
इसके उद्देश्य है -
1 ) युवा पीढ़ी को संसद की कार्यवाही से अवगत कराना
2 ) युवा मस्तिष्क को अनुशासन एवं संबंध तथ्यों से परिचित कराना ।
3 ) छात्र / युवा समुदाय में लोकतंत्र के आधारभूत मूल्यों को समझाना ताकि उन्हें लोकतांत्रिक संस्थानों के कार्यों की सही जानकारी मिल सके ।
इस योजना को समझाने के लिए संसदीय कार्य मंत्रालय राज्यों को जरूरी प्रशिक्षण व योजना को लागू करने के लिए प्रोत्साहित करता है ।
अविश्वास प्रस्ताव क्या होता है ?
संविधान के अनुच्छेद 75 में कहा गया है कि, मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामुहिक रूप से उत्तरदायी होगी, इसका मतलब मंत्रिपरिषद तभी तक है, जब तक कि उसे सदन में बहुमत प्राप्त है, दूसरे शब्दों में लोकसभा, मंत्रिमंडल को अविश्वास प्रस्ताव पारित कर हटा सकती है । ऐसे प्रस्ताव के समर्थन में 50 सदस्यों की सहमति अनिवार्य है ।
विश्वास प्रस्ताव क्या होता है ?
विश्वास प्रस्ताव - अधूरे जनादेश के परिणामस्वरूप, त्रिशंकु संसद, अल्पमत सरकार तथा गठबंधन सरकार आदि परिस्थितियों से निपटने के लिए एक प्रक्रियात्मक उपाय के तौर पर विश्वास प्रस्ताव का प्रावधान किया गया है कमजोर बहुमत वाली सरकारों को सदन में बहुमत सिद्व करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित किया जाता है, कभी-कभी स्वयं बहुमत सिद्व करने के लिए भी सरकार विश्वास प्रस्ताव लाती है, यदि यह विश्वास प्रस्ताव गिर जाता है तो सरकार भी गिर जाती है ।
Must read - अविश्वास प्रस्ताव क्या होता है ?
जमानत ( Bail ) का अर्थ , जमानत के प्रकार
जमानत - जब किसी व्यक्ति को, किसी अपराध के कारण पुलिस द्वारा या न्यायालय द्वारा कारागार में बंद किया जाता है ओर ऐसे व्यक्ति को कारागार से छुड़ाने के लिए, न्यायालय में जो संपत्ति जमा की जाती है , या देने की शपथ ली जाती है, उसे जमानत कहते हैं ।
जमानत के प्रकार -
1 ) रेगुलर ज़मानत
2 ) अंतरिम जमानत
3 ) अग्रिम जमानत
1 ) रेगुलर जमानत - CRPC की धारा 439 में रेगुलर बैल या नार्मल बैल की व्यवस्था की गई है, जब आरोपी व्यक्ति का मामला कोर्ट में पेंडिंग होता है तब वह व्यक्ति उस दौरान जमानत की अर्जी लगा सकता है । तब ट्रायल कोर्ट या हाई कोर्ट जैसी भी स्थिति हो, अर्जी पर बैल देने से पहले मामले की गंभीरता ओर आरोपी व्यक्ति का पूर्वाचरण आदि सब देखने के बाद ही, बैल एप्लिकेशन स्वीकार या अस्वीकार करती है ।
2 ) अंतरिम बैल - जब आरोपित व्यक्ति बैल के लिये आवेदन करता है तो कोर्ट द्वारा जांच की जाती है, तथा जांच के दौरान समय भी लगता है तो ऐसी स्थिति में जब तक बैल आवेदन पर कोर्ट अंतिम निर्णय नहीं देती है, उससे पहले ही अंतरिम जमानत जिसे राहत बैल भी कह सकते हैं, प्रदान की जाती है ।
3 ) अग्रिम जमानत - जैसा की नाम से ही स्पष्ट है कि गिरफ्तारी से पहले ही होने वाली जमानत धारा 438, CRPC में प्रावधान है कि, जब किसी व्यक्ति को यह युक्तियुक्त आशंका हो कि कोई उसे अजमानतीय अपराध में फ़साने वाला है या उसकी गिरफ्तारी हो सकती है तो वह हाई कोर्ट या शेषन कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है, ओर यदि कोर्ट द्वारा उसकी अग्रिम जमानत स्वीकार कर ली जाती है, तो उसे संबंधित मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है ।
रिट याचिका का क्या अर्थ है ? यह कितने प्रकार की होती है ?
जब हमारे मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो हम सीधे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट रिट के माध्यम से मूल अधिकारों के क्रियान्वयन के लिए रिट याचिका जारी करवा सकते है । इस तरह दोनों ही न्यायालय को मूल अधिकारों का रक्षक एवं ग्यारंटी देने वाला न्यायालय कहा जाता है
रिट याचिका सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट दोनों जारी कर सकते हैं
सुप्रीम कोर्ट में आर्टीकल - 32 के तहत
हाई कोर्ट में आर्टिकल - 226 के तहत
रिट याचिका 5 प्रकार की होती है -
1 ) बंदी प्रत्यक्षीकरण - इसे लेटिन भाषा से लिया गया है । जिसका अर्थ होता है, व्यक्ति को सशरीर प्रस्तुत किया जाए यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है, या जबरन उसकी स्वतंत्रता पर बंधन लगाया जा रहा है, तो ऐसा पीड़ित व्यक्ति स्वयं या उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति भी न्यायालय से "बंदी प्रत्यक्षीकरण " की रिट जारी करवा सकता है ।तब न्यायालय मामले की जांच करता है, तथा उसकी स्वतंत्रता के लिए आदेश जारी करता है । स्वतंत्र रहना हर व्यक्ति का मूल अधिकार है " बंदी प्रत्यक्षीकरण " रिट - सार्वजनिक प्राधिकरण हो या व्यक्तिगत दोनों के खिलाफ जारी की जा सकती है ।
Must read - जमानत ( bail ) का अर्थ , जमानत के प्रकार
2 ) परमादेश - इसका अर्थ है आदेश देना - इसे सार्वजनिक अधिकारियों के विरुद्ध जारी किया जाता है, यदि कोई सरकारी कर्मचारी, कोई यूनिट, निगम, प्राधिकरण, अधीनस्थ न्यायालय अपने कार्यों या कर्तव्यों का पालन करने से इंकार करते है, तब न्यायालय उनसे
" परमादेश " रिट के जरिये आदेश देते हैं , कि वे अपने कर्तव्यों के पालन में उपेक्षा क्यो कर रहे है , उनसे कारण पूंछा जाता है । इस प्रकार " परमादेश " रिट के माध्यम से न्यायालय सरकारी अधिकारियों पर नियंत्रण का कार्य करते है ।
3 ) प्रतिषेध - इसका अर्थ है रोकना यह रिट याचिका न्यायिक प्रकृति की है, यदि कोई अधीनस्थ न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर कार्य करता है, या अपने अधिकारों का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं करता है, या नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया जाता है, तो हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट अधीनस्थ न्यायालयो को निर्णय देने से पहले रोक देता है, तथा उनसे आगे कार्यवाही करने के लिये मना कर दिया जाता है, जब तक कि वे सुपीरियर न्यायालय का समाधान न कर दे ।
4 ) उत्प्रेषण - " उत्प्रेषण रिट ओर प्रतिषेध रिट " दोनों ही न्यायिक नेचर की है, बस दोनों में इतना ही अंतर है कि प्रतिषेध रिट निर्णय के पहले जारी की जाती है, ओर उत्प्रेषण रिट निर्णय के बाद जारी की जा सकती हैं।
5 ) अधिकार प्रच्छा - जिसका अर्थ है " प्राधिकृत " या यह कह सकते है, कि कोई प्राधिकार्रवान व्यक्ति अपने अधिकार का दावा करता है, तो न्यायालय ऐसे व्यक्ति के दावे की जांच करने के बाद उस व्यक्ति के हित में जो वास्तव मे दावेदार है, उसे उसका अधिकार पुनः दिलाने के लिये " अधिकार प्रच्छा " रिट जारी करके उस व्यक्ति के खिलाफ आदेश जारी करता है जो अनाधिकृत रूप से कब्जा धारण किये हुए हैं ।यह रिट भी सार्वजनिक कार्यलयों के खिलाफ ही जारी की जाती है, जिससे कि वैध रूप से हकदार या प्राधिकार्रवान व्यक्ति को कोई हानि या नुकसान न उठाना पड़े ।
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