समान सिविल संहिता

अनुच्छेद 44 यह अपेक्षा करता है कि भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेंगा ।

सामान सिविल संहिता की आवश्यकता पर बल देते हुए न्यायमूर्तियो ने कहा कि यह बड़े आश्चर्य की बात है कि संविधान को लागु हुए 70 वर्ष से अधिक बीत गए, इस बीच अनेक सरकारे आई-गई लेकिन आर्टिकल 44 को आज तक कार्यान्वित नहीं किया जा सका । आर्टीकल 44 इस धारणा पर आधारित है कि " धर्म ओर वैयक्तिक विधि " में कोई संबंध नहीं होता । इससे सभी समुदायों में समानता होगी ओर देश की एकता ओर अखंडता भी शशक्त होगी । हमारे देश के ही राजनेता वोट की राजनीति में फंसकर मुस्लिम तुष्टिकरण मे लगे हुए है ओर उनमें यह साहस नहीं है कि वे उन्हें समझाए कि उससे उनका कितना लाभ होगा । सभी दल संविधान के पालन की दुहाई देते है, किंतु मुस्लिम समुदाय में स्त्रियों की दशा सुधारने के लिये वैयक्तिक विधि का आधुनिकीकरण करने से कतराते हैं । और संविधान के निर्देश की अवहेलना कर रहे है ।


अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के पर प्रधानमंत्री श्री राव यह कहते नहीं थकते थे कि वे इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का पालन करेंगे । किन्तु उच्चतम न्यायालय ने जब "समान सिविल संहिता" बनाने का आदेश दिया तो इसका पालन न करने की घोषणा करके उन्होने न्यायपालिका ओर संविधान दोनों की अवहेलना की । बाबरी मस्जिद के मामले में आने वाले न्यायालय के निर्णय का भी सरकार पालन न करे तब क्या होगा । क्या इससे देश की एकता व अखंडता को संकट उत्पन्न नहीं होगा । कुछ साहसिक निर्णयो द्वारा सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट द्वारा ने समान सिविल संहिता बनाये जाने के लिये मार्ग प्रशस्त किया है । अतः समान सिविल संहिता का बनाना आवश्यक है ।

कोरम या गणपूर्ति क्या है

कोरम या गणपूर्ति, संसद या विधानमंडल के सदस्यो की वह न्यूनतम संख्या है, जिनकी उपस्थिति में सदन का कार्य संपादित होता है अर्थात कोरम के लिये प्रत्येक सदन में कुल सदस्यों का 1/10 वा भाग या दसवां हिस्सा होता है इसका मतलब सदन की कोई कार्यवाही तब तक नही चलेंगी जब तक की लोकसभा हैं, तो 550 का दसवां भाग मतलब 55 सदस्य, राज्यसभा है तो
 250 का दसवां भाग मतलब 25 सदस्य अवश्य होने चाहिये । यदि सदन के संचालन के समय कोरम पूरा नहीं होता है तो, अध्यक्ष या सभापति का यह दायित्व होता है कि या तो वह सदन को स्थगित कर दे, या गणपूर्ति तक कोई कार्य सम्पन्न न करे ।

संसद मे प्रश्नकाल और शून्यकाल क्या होता है । ओर यह कब शुरू होता है व प्रश्न कितने प्रकार के होते है।

प्रश्नकाल - संसद का जब सत्र शुरू होता है, तो शुरुआत का पहला घंटा " प्रश्नकाल "के लिये होता है। इसमें सामान्यतः सदस्य (M.P.) प्रश्न पूछते हैं, ओर मंत्री ( minister ) उत्तर देते हैं । 

प्रश्न तीन तरह के होते है ।
1 ) तारांकित
2 ) अतारांकित
3 ) अल्पसूचना वाले
* तारांकित प्रश्नो का उत्तर मौखिक दिया जाता है ।
* अतारांकित प्रश्नों का उत्तर लिखित में दिया जाना आवश्यक है ।
 * अल्पसूचना के प्रश्न वो प्रश्न होते हैं, जिन्हें कम से कम 10 दिनों का नोटिस देकर पूछा जाता है । इनका उत्तर भी मौखिक दिया जाता है ।
शून्यकाल -शून्यकाल, प्रश्नकाल के तुरंत बाद शुरू होता है, जिसमें संसद सदस्य बिना पूर्व सूचना के मामले उठा सकते है । ओर इसी से सदन के नियमित कार्यक्रम या प्रकिया शुरू होती है । 
दूसरे शब्दों में - प्रश्ननकाल ओर कार्यक्रम या प्रक्रिया शुरू होने के मध्य के समय को "शून्यकाल " कहते हैं ।
संसद में यह प्रक्रिया 1962 से जारी है ।

मूल अधिकार ( fundamental right )

भारतीय संविधान के भाग 3 में आर्टिकल 12 से 35 तक मूल अधिकारों के बारे में बताया गया है । मूल अधिकारों को हमने अमेरिका के संविधान से अडॉप्ट किया है ।

संविधान द्वारा बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति के लिये समानता, सम्मान, व अधिकार के संबंध मे ग्यारंटी दी गई है ।मूल अधिकार कठोर नियमो के खिलाफ नागरिको की आजादी की सुरक्षा करते हैं । एवं तानाशाही को मर्यादित करते है ।
मूल अधिकारों को यह नाम इसलिये दिया गया है क्योंकि इन्हें संविधान द्वारा सुरक्षा एवं गारंटी प्रदान की गई है जो राष्ट्रीय कानून का मूल सिद्धांत है । ओर मूल इसलिये भी है कि व्यक्ति के चहुमुखी विकास के लिये आवश्यक भी है ।
संविधान में 06 प्रकार के मूल अधिकारों का उल्लेख है, इनमें से कुछ अधिकार केवल भारतीय नागरिकों के लिए ही है, जैसे - आर्टीकल - 15, 16, 19, 29, 30 तथा बाकि नागरिकों / व्यक्तियों दोनों के लिये है ।
ये असीमित नहीं है, इन पर राज्य द्वारा प्रतिबंध भी लगाए जा सकते है लेकिन सामान्य परिस्थितियों में नहीं, कुछ अपवादिक परिस्थितियों में ही ।
मूल अधिकारों का उल्लंघन होने पर पीड़ित व्यक्ति सीधे उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय जा सकता है ।
ये स्थाई नही है, इनमें संसद द्वारा कटौती या कमी की जा सकती है लेकिन, संशोधन अधिनियम के द्वारा ही न कि साधारण विधेयक द्वारा ।
वास्तव में मूल अधिकारों के संबंध में जितना विस्तृत विवरण हमारे संविधान में है उतना विश्व के किसी भी देश में नहीं ।

ग्राम न्यायालय का अर्थ

ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 को निचले स्तर पर यानि तृणमूल ( grassroots ) स्तर पर गरीबो एवं साधनहीन लोगों तक न्याय सुलभ कराना तथा गरीबो को उनके दरवाजे पर ही न्याय सुलभ हो सके इसलिये यह अधिनियम पारित किया गया,इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सामाजिक, आर्थिक व अन्य किसी कारण से कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न हो सके ।

* ग्राम न्यायालय प्रत्येक पंचायत के लिये स्थापित किया जाएगा ।
* ग्राम न्यायालय एक चलित न्यायालय ( mobile court ) होगा ।
* ग्राम न्यायालय, दीवानी / फौजदारी दोनों प्रकार के मामले सुनेगा ।
इस अधिनियम के अंतर्गत 5000 ग्राम न्यायालयों की स्थापना का आदेश केंद्र सरकार द्वारा दिया गया है,
अतः हम यह कह सकते हैं ग्रामीण गरीब व साधनहीन लोगों तक न्याय पहुचाने के लिये सरकार का यह प्रयास सफल एवं प्रशंसनीय  है ।

अध्यादेश क्या होता है ?

अध्यादेश जारी करने की शक्ति - राष्ट्रपति ओर राज्यपाल दोनों को होती है। इसे हम यह कह सकते हैं कि, कच्चा क़ानून / अधूरा कानून। अर्थात जब कोई कानून- नियम अधिनियम बनाया जाता है तो, संसद के दोनों सदनो से पारित होने के बाद या राज्य का कोई कानून है तो विधानमंडल से पारित होने के बाद ही पूर्ण रूप से लागू होता है लेकिन अध्यादेश उस परिस्थिति में जारी किया जाता है जब राज्य या देश में परिस्थिति ऐसी है कि तुरंत ही किसी कानून /विधि / नियम की आवश्यकता है, तथा जब सत्र नही चल रहा है, तब राष्ट्रपति / राज्यपाल किसी आपात स्थिति में, व्यवस्था को संभालने के लिये तुरंत प्रभाव से ऐसे नियमो / कानूनों की घोषणा करते हैं,


 विशेष परिस्थितियों के हिसाब से आवश्यक है ओर चूंकि, सत्र नही चलने के कारण दोनों सदनों से पारित भी नहीं किया जा सकता है, तो राष्ट्रपति / राज्यपाल द्वारा नियमो की ऐसी घोषणा को जो समय व परिस्थितियों को देखते हुए अनिश्चित समय के लिये की जाती है। ऐसी घोषणा " अध्यादेश " कहलाती है।

       यही अध्यादेश  जब दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है तो ( सत्र शुरू होने के बाद ) संसद के दोनों सदनो / विधानमंडल से पारित हो जाता है । तो यह " अध्यादेश permanent law बन जाता है और यदि सदनो से मंजूरी नही मिलती है तो ऐसा अध्यादेश ( उस temporary time )  के बाद स्वतः ही समाप्त हो जाता है । उसकी कोई विधिक वैल्यू नही होती।
" अर्थात हम यह कह सकते हैं कि समय / परिस्थितियों की मांग के हिसाब से तुरंत प्रभाव से लागू करने के लिये, नियमो की ऐसी घोषणा को अध्यादेश कहते हैं ।

न्यायिक समीक्षा ( judicial review )

न्यायिक समीक्षा न्यायपालिका की शक्ति है, जो केंद्र ओर राज्य सरकार दोनों पर लागू होती है।यदि केंद्र या राज्य सरकार कोई नियम, विधि,कानून बनाते हैं तो ऐसे नियमों (कानूनो) का परीक्षण या उसकी वैधता की जांच सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जाती है, ओर उन कानूनो की वैधता की जाँच के बाद, यदि न्यापालिका को लगता है कि ऐसे नियमों से संविधान का उल्लंघन हो रहा है या मानवधिकारों का उलंघन हो रहा है, तब उन्हें अवैध, असंवैधानिक तथा अमान्य घोषित कर दिया जाता है।

फिर सरकार ऐसे नियमों को लागू नहीं कर सकती है।
"भारत में संविधान ही सर्वोच्च है" ओर किसी कानून की वैधता के लिये उसका संविधान के अनुसार होना जरूरी है और न्यापालिका ही तय कर सकती है कि कोई अधिनियम संवैधानिक है या नही।
Judicial review की power "न्यायपालिका की सर्वोच्च शक्तियों मैं से एक है,ओर उसे संविधान से ही मिली है। हमारे मौलिक अधिकार सविंधान का हिस्सा है,ओर वो आज भी ओर हमेशा अस्तित्व में है, तो उसका श्रेय " न्यायिक समीक्षा " को ही जाता है, सर्वोच्च न्यायालय को सविंधान को क़ायम रखने का दायित्व सौंपा गया है। संविधान में शक्ति के संतुलन की जो व्यवस्था की गई है वह बनी रहे ओर विधायिका + कार्यपालिका अपने कर्तव्यों के निर्वहन में अपनी संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं कर पाए ।

संसद किसे कहते है ?

संविधान के अनुसार भारत की संसद के तीन अंग हैं       1 ) राष्ट्रपति    2) लोकसभा   3) राज्यसभा।              लोकसभा- निम्न सदन , ओर राज्यसभा - उच्च सदन कहलाता है 
                                                    हालांकि, राष्ट्रपति किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है ओर नाही वह किसी सदन में बैठता है, लेकिन राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है।संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कोई भी विधेयक (bill) राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति मिलने के बाद ही "विधि " बनता है।भारतीय संसद में राष्ट्रपति का स्थान सर्वोच्च है, दोनों सदनों को बुलाना, लोकसभा का विघटन, अध्यादेश जारी करना, ओर कई विशेषाधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त है। अतः हमारी भारतीय संसदीय पद्धति में तीनो अंग राष्ट्रपति + लोकसभा + राज्यसभा परस्पर मिल कर ही राज्य व्यवस्था को क्रियान्वित करते है व तीनों एक दूसरे पर निर्भर है। ये तीनों अंग मिलकर ही ' संसद ' का निर्माण करते हैं।इसलिए कहा जाता हैं कि हमारे यहां द्विसदनात्मक संसदीय प्रणाली है।या संसदीय व्यवस्था है।



जनहित याचिका का अर्थ


भारत में जनहित याचिका या P I L की उत्पत्ति न्यायिक सक्रियता का ही एक रूप है। न्यायमूर्ती पी.एन. भगवती ने इस अवधारणा को सार्थक रूप प्रदान किया

इसके अंतर्गत कोई भी जनभावना वाला व्यक्ति या सामाजिक संगठन किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को उनके अधिकारों के लिये न्यायालय जा सकता है। प्रायः ऐसे व्यक्ति जो अज्ञानता, निर्धनता, सामाजिक-आर्थिक रूप से अक्षम होने के कारण न्यायालय में उपचार हेतु नहीं जा सकते तो कोई भी व्यक्ति इनकी मदद हेतु उनके अधिकारों के लिए उनकी ओर से न्यायालय में जा सकता हैं। 

         PIL का सामान्य अर्थ है,सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को न्याय दिलाना या जनहित में कार्य करना ।

न्यायिक सक्रियता का अर्थ

 भारत मे न्यायिक सक्रियता का सिद्धांत 1970 के दशक के मध्य में आया। न्यायिक सक्रियता की नींव न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर, पी.एन. भगवती, ओ.चिन्नप्पा रेडडी तथा डी. ए. देसाई ने रखी।


इसका अर्थ है , नागरिको के अधिकारों व समाज मे न्याय को बढ़ावा देने के उद्देश्य से न्यायपालिका खुद आगे बढ़कर सक्रिय होकर कार्य करती है, न्यायपालिका स्वंय एक्टिव होकर समाजहित में , जन कल्याण में कार्य करती है ।

" न्यायिक सक्रियता को न्यायिक गतिशीलता " भी कहते है

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गणतंत्र का अर्थ

 एक लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था को दो वर्गों में बाटा जा सकता है--राजशाही और गणतंत्र ! राजशाही व्यवस्था में राज्य का प्रमुख (आमतौर पर राजा या रानी ) उत्तराधिकारीता के माध्यम से पद पर आसीन होता है, जैसे कि ब्रिटेन में। वही गणतंत्र में राज्य प्रमुख हमेशा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से एक निश्चित समय के लिए चुनकर आता है , जैसे अमेरिका ।


      इसलिए भारतीय सविंधान की प्रस्तावना में गणतंत्र का अर्थ यह है कि भारत का प्रमुख अर्थात राष्ट्रपति चुनाव के जरिये सत्ता में आता है । उसका चुनाव पांच वर्ष के लिए अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है ।

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      गणतंत्र के अर्थ में दो ओर बाते शामिल है ।पहली यह कि राजनेतिक सम्प्रुभता किसी एक व्यक्ति जैसे राजा के हाथ मे होने की बजाये लोगो के हाथ मे होती है , और दूसरी , किसी भी विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की अनुपस्थिति । इसलिए हर सार्वजनिक कार्यालय बगेर किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक के लिए खुला होगा ।

पूजा स्थल कानून ( worship act 1991) क्या हे ?

 * कांग्रेस की नरसिम्हा सरकार 1991 में  यह कानून लेकर आई थी |   *मंदिर आन्दोलन के दोर में बढते, मंदिर - मस्जिद  विवादों को रोकने...